الفصل 2 | من 14 فصل

رواية ابناء الجبالي الفصل الثاني 2 - بقلم رنا احمد

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في ڤيلا الجبالي، ساد الصدمة على الجميع. ابتسم جميل فقط عندما عرف ما يدور في عقل صاحبه. "جدي، ممكن أفهم إيه اللي سمعته ده؟ هتكون مرات مين؟ " سأل سليم بانفعال. رد حسن بنبرة غير قابلة للنقاش: "مراتك أنت يا سليم، والموضوع ده مفيش فيه نقاش. أنت خابر زين إن فيه قرارات مبحبش حد يناقشني فيها." "لا يا جدي، آسف بس دي حياتي أنا. أنا مستحيل أوافق على كده، ده هبل! " قال سليم بغضب. صفعة قوية تلقاها سليم من حسن، صدمت الكل.

"چاك، اقطع لسانك لما تقول على چدك أهبل أو بيقول كلام هبل! " صرخ حسن بصوت عالٍ. "أنا آسف يا جدي، حقك عليا. بس أنت بتطلب مني المستحيل، أتزوج واحدة معرفهاش. طب فهمني دماغك." قال سليم باعتذار وأسف. "الكلام خلص لحد كده." قال حسن بحدة. "لا مخلصش، هو أنا إيه؟ لعبة في إيديكم تقرروا مصيرها على كيفكم؟ أنا مستحيل أوافق على الكلام ده." قالت داليا بدموع وقهرة. جرت داليا خارج الڤيلا.

"روح وراها. حياتك قصاد دمعة واحدة ممكن تنزل منها يا سليم." قال حسن بحدة لسليم. جري سليم وراها وهو مش فاهم ليه جده بيعمل كده. في الشركة، كانت حياه جالسة بدموع. دخل ريان بغضب. "بقا كده يا روح أمك، عملالي فيها شريفة وبتشتكيني لأدهم باشا؟ طب اعملي حسابك إن ده آخر يوم ليكي في الشركة يا ست حضرة."

"أبوس إيدك يا ريان بيه، أنا بت غلبانة مش قدك. أنت عارف ظروفنا، أبويا لو قعدت من الشغل مش بعيد يرميني في الشارع." قالت حياه بدموع. قرب منها ريان بخبث. "توتو، تصدقي صعبتي عليا؟ طب ما دام كده، ليه العند؟ اللي أنتِ عايزاه هتخديه." بعدت حياه وتعصبت. "لا، إزاي؟ كان كده؟ ملعون أبو الشغل على يجي بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ...

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بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ...

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بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ...

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بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ...

بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ...

بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ...

بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ...

بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ... بـ...

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